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स्वाध्यायप्रवचन 5 :अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च

'अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च'

मैं मई २०१२ में, युवतियों के एक गुट के साथ अरुणाचल प्रदेश के अलो गाव गया था। वहाँ हम रामकृष्ण मिशन के आश्रम में देर रात पहुँचे। अधिकांश लड़कियाँ यात्रा से थकी हुई थीं। देर हो जाने के कारण, मठ के ब्रह्मचारी महाराज ने सुझाव दिया कि हम सीधे भोजनगृह में जाएँ, भोजन करके विश्राम करें और सुबह सबसे परिचय करेंगे। भोजनगृह में एक स्वामीजी हमें भोजन परोस रहे थे। लड़कियाँ उन्हें बुलाकर अपनी जरूरत के व्यंजन मांग रही थीं । स्वामीजी अत्यंत शांति और विनम्रता से उनकी खातिरदारी कर रहे थे, उनकी इच्छानुसार व्यंजन परोस रहे थे। भोजन के बाद, पूरा गूट तुरंत विश्राम के लिए चला गया। अगले दिन, उपासना और मंदिर दर्शन के बाद हम आश्रम के मुख्य स्वामीजी से मिलने उनके कार्यालय गए। रात को भोजन परोसने वाले स्वामीजी ही आश्रम के मुख्य स्वामीजी थे। उन्हें प्रमुख कार्यालय में देखकर लड़कियाँ स्तब्ध रह गईं।

उसी दिन शाम को हम एक नदी पर बने झूलते पुल और एक जनजाती बस्ती को देखने गए। बस्ती में हमारा बहुत अच्छा स्वागत हुआ। लड़कियों को चार-चार के समूह में विभाजित कर अलग-अलग घरों में भेजा गया। कुछ स्थानों पर गाँव की युवतियों से त्योहारों, खान-पान, शिक्षा और कोरियाई फिल्मों जैसे विभिन्न विषयों पर बातचीत हुई। एक-दो स्थानों पर लड़कियों ने  अरुणाचल का पारंपरिक नृत्य भी सीखा । और कुछ घरो में निश्चित ही, सबसे रोचक कार्यक्रम था—पारंपरिक पहनावा और आभूषणों से सजढज ना ।

 बातचीत शुरू होते ही, एक नानी (घर की बुजुर्ग महिला) ने तुरंत अपने आलमारी सें  पारंपरिक पोशाक और कुछ आभूषण निकालकर लड़कियों को पहनने के लिए दिए। घर से बाहर निकलते समय, मैंने हल्के अंदाज में लड़कियों से पूछा, "क्या आपको अंदाजा है की  इन आभूषणों की कीमत कितनी होगी?" एगेट स्पटिक मणियों से बनी इन पारंपरिक की मालाओं की कीमत लाखों रुपये तक थी!

उस रात यात्रा की समीक्षा बैठक में दो महत्वपूर्ण सवाल युवतियों की चर्चा मे सामने आए:

पहला सवाल: जो एक बड़े मठ के मुख्य संचालक स्वामीजी है, दिन में हमारे साथ  तत्त्वज्ञान पर चर्चा कर रहे थे, वे पिछली रात इतनी सहजता से हमारा सत्कार क्यों कर रहे थे; हमे खाना क्यो परोस रहेथे ? अगर हमें पहले पता होता कि वे इतने बड़े महाराज हैं, तो हम उनसे तरहतरह की मांगे न करते ।

दूसरा सवाल: मेरी माँ आज भी मुझे घर के कीमती आभूषण पहनने के लिये देने में कतराती, लेकिन उन नानी ने इतनी सहजता से इतने कीमती आभूषण हमे जैसे अनजान लोगोंको दे दिए! अगर हमारे घर किसी दूसरे राज्य की लड़कियाँ मेहमान बनकर आतीं, तो क्या मेरी माँ उन नानी जितनी सहजता से उन्हें अपने आभूषण पहनने देतीं?

इन दोनों सवालों का जवाब एक ही है—
अतिथि देवो भव’।
जो हमारे पास आते हैं, उनकी  भगवान समझकर सेवा करो,
और हमारे पास जो सबसे श्रेष्ठ है, वह  उन्हें स्नेहपूर्वक उपलब्ध कराओ।

यात्रा इंसान को बहुत कुछ सिखाती है। यात्रा में आप या तो अतिथि होते हैं, या फिर मेज़बान होते हैं। अतिथि का सत्कार करने या अतिथी बनकर उसे स्वीकार करते समय एक गहरी सीख मिलती है।

भारतीय शैक्षिक परंपरा में अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च’ को अध्ययन का एक महत्वपूर्ण सूत्र और  संस्कार माना गया है।

जब कोई मेहमान हमारे घर आता है, तो मेहमानों की उनकी सुविधाओं का ध्यान रखते समय हमें अपनी रोज़मर्रा की आदतों में कई समझौते करने पड़ते हैं। हमें अपनी चीज़ें, रहने; सोने की जगह साझा करनी पड़ती है। इतना ही नही, खाना बनाते समय हम अपनी पसंद का भोजन न बनाकर, मेहमान की पसंद को प्राथमिकता देते हैं। इस प्रक्रिया में कुछ कार्य स्वाभाविक रूप से आनंददायक होते हैं, जबकि कुछ में हमें समायोजन करना पड़ता है।

इसी प्रकार, जब हम स्वयं किसी स्थान पर मेहमान के रूप में जाते हैं, तो हमें मेज़बान द्वारा किए गए प्रेमपूर्ण सत्कार को विनम्रता से स्वीकार करना पडता है। भले ही कुछ बाते हमारी पसंद की न हों, फिर भी हम उनका स्नेह और आतिथ्य देखकर उनकी भावनाओं का आदर करते हुये उन्हें खुले मन से अपनाते हैं, स्वीकार करते हैं।

इस तरह, किसी का स्वागत करने से या किसी के सत्कार को स्वीकार करने से हमारा मन अपनेपन और संतोष का अनुभव करता है फलस्वरूप  हममें एक मानसिक उदारता और समझ विकसित होती है ।

मन की ऐसी उदारता को विकसित करने का अभ्यास ही

अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च’ का वास्तविक स्वाध्याय है।

घर आने वाला प्रत्येक व्यक्ति हमारे लिए उस क्षेत्र की जानकारी प्राप्त करने का पहला, प्रत्यक्षदर्शी और महत्वपूर्ण प्राथमिक ज्ञान स्रोत होता है। उसके पास यात्रा के दौरान अर्जित अनुभवों का खजाना होता है। विभिन्न स्थानों और परिस्थितियों में रहने के कारण उसमें जो समझ विकसित होती है, वह भी अत्यंत मूल्यवान होती है।

अतिथि, एक प्रकार से, ज्ञान और अनुभवों का भंडार होता है।

‘अतिथयश्च’ का स्वाध्याय करने का अर्थ है—

घर आए मेहमान से संवाद स्थापित करना

और उसके अनुभवों से सीखना।

इसके लिए संवाद की कला में दक्ष होना आवश्यक है

ताकि अतिथि को अपने विचार साझा करने का अवसर मिले

और उनके अनुभव हमारे लिए नए दृष्टिकोण और संभावनाओं के द्वार खोल सके।

प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में एक कहानी है,

जिसे समझना और आत्मसात करना ज्ञानार्जन का एक महत्वपूर्ण साधन हो सकता है।

इसलिए, ‘अतिथयश्च’ का वास्तविक स्वाध्याय करने के लिए हमें अपने घर में विभिन्न क्षेत्रों के मेहमानों को आमंत्रित करना चाहिए, जिससे घर के सदस्यों को उनके साथ वार्तालाप करने का अवसर मिले और पूरा परिवार उनके अनुभवों से सीख प्राप्त कर सके।

इसी तरह, जब हम पर्यटन के उद्देश्य से या कार्यवश अलग-अलग स्थानों पर जाते हैं, तो हमें प्रवास के दौरान वहाँ के लोगों से संवाद करने और उनके अनुभवों को जानने के लिए अपनी प्रवास योजना में समय अवश्य रखना चाहिए।

ज्ञान प्राप्त करना, देश की संस्कृति और परंपराओं को समझना, समाज तथा लोकजीवन का अनुभव करने के लिए यात्रा करना आवश्यक है। हमें लोगों के अतिथ्य को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि मातृभूमि का वास्तविक परिचय प्राप्त करने के लिए यात्रा सबसे उत्तम स्वाध्याय है। मुहम्मद पैगंबर का एक प्रसिद्ध वचन है— "तुम्हारे पास कितनी शिक्षा है, यह मुझे मत बताओ; तुमने कितनी यात्राएँ की हैं, यह बताओ।"

‘अतिथि’ वह होता है जो बिना किसी पूर्व सूचना के,

सीमित समय के लिए आता है और सामान्यतः अपरिचित होता है।

जो परिचित होता है और लंबे समय तक ठहरता है,

उसे 'अभ्यागत' कहा जाता है।

पुरानी कथाओं में वर्णन मिलता है कि चातुर्मास के दौरान कोई साधु या संन्यासी चार महीने तक किसी संकल्प के साथ एक ही स्थान पर रहते थे और किसी ग्रंथ का अध्ययन व प्रवचन करते थे। उनके प्रवास के दौरान, स्थानीय लोग उनके सत्संग (सहवास) का लाभ उठाकर और उनकी सेवा कर ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ते थे।

चातुर्मास की यह परंपरा यह दर्शाती है कि थोड़े लंबे समय के लिए ज्ञान का आदान-प्रदान और गुरुजनों की सेवा किस प्रकार हमें सीखने का एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। पहले, वर्षा ऋतु के दौरान यात्रा करना सुरक्षित नहीं होता था, इसलिए परिव्राजकों (घूमने वाले साधुओं) को एक ही स्थान पर ठहरने का निर्देश शास्त्रों में दिया गया था।

आजकल, आधुनिक सुविधाओं के कारण चातुर्मास का विधिवत पालन आवश्यक नहीं रह गया है। लेकिन आज कई सामाजिक संस्थाएँ कुछ महीनों के लिए अध्ययनवृत्तियाँ (फेलोशिप) आयोजित करती हैं, जो चातुर्मास की परंपरा का एक नया रूप हो सकता है। ऐसे अध्ययन के अवसर देना और स्वीकार करना ही आज के समय में "अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च" का एक नया और सार्थक रूप है।

इस कृतीरूपी अतिथी सेवा के स्वाध्याय के साथ एक और स्वाध्याय जो स्वयं के बारे में है उसका भी विस्तार इंस स्वाध्याय के अर्थ मे समायोजित है ।.

अतिथि वह होता है, जिसके आने का कोई निश्चित समय नही होता और जो कभी भी घर आ सकता है। इसी तरह, एक और अतिथि है जो बिना हमारी अनुमति के हमारे भीतर प्रवेश करता है—हमारे विचार और हमारी इच्छाएँ। हमारे मन में अनायास उत्पन्न होने वाले विचार बिना बुलाए अतिथि की तरह ही आते हैं।

अक्सर, हम इन विचारों को थामने  के लिए सचेत नही होते। कई बार, विचार और इच्छाएँ हमें अचेतन रूप से प्रभावित कर लेती हैं और हमारा नियंत्रण अपने हाथो  में ले लेती हैं।

इसलिए, हमें अपने मन को सतर्क रखना चाहिए और अपनी बुद्धि को सटीक प्रतिक्रिया देने योग्य बनाना चाहिए। मन की सतर्कता बढ़ाना और उसका अध्ययन करना आवश्यक है। जो विचार और इच्छाएँ हमारे भीतर उत्पन्न होती हैं, उनके प्रति सतर्कता बनाए रखना और उनका अध्ययन करना भी "अतिथयश्च स्वाध्याय प्रवचने च" सूत्र का एक रूप है।

सतर्क मन व्यक्ति में क्या बदलाव ला सकता है? इस संदर्भ में, एक पढ़ी हुई कहानी याद आती है—"द हीलिंग नाइफ!"

सत्रह वर्षीय जॉर्ज, जो व्हाइट रशियन नौसेना में लेफ्टिनेंट था, को बोल्शेविक सेना के एक गुट के खिलाफ खोले गए मोर्चे पर भेजा जाता है। समुद्र तट पर उतरने के बाद उसकी टुकड़ी को बोल्शेविक खंदक पर हमला करने का आदेश मिलता है। जॉर्ज अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए खंदक पर जोरदार हमला करता है। बर्फीली हवा में गोलियों की बौछार शुरू हो जाती है, और खंदक में उतरते ही बंदूक के नोक पे लगी संगीनोंकी की टकराहट गूँजने लगती है। घायल सैनिकों को पीछे भेजकर उनकी जगह नए सैनिक तैनात किए जाते हैं।

लड़ाई के दौरान जॉर्ज का एक मित्र गोली लगने से घायल हो जाता है। जॉर्ज तुरंत मदद भेजता है और अपने मित्र को इलाज के लिए सुरक्षित स्थान पर भिजवा देता है।

संध्या होते-होते लड़ाई की तीव्रता कम हो जाती है। दोनों पक्ष एक उचित दूरी बनाए रखते हुए पीछे हटते हैं और अपने मोर्चे मजबूत करते हैं। रात को आधार शिविर (बेस कैंप) लौटने के बाद जॉर्ज घायल सैनिकों की स्थिति देखने जाता है। मशालों और आग की रोशनी में, वह तात्कालिक उपचार केंद्र में अपने मित्र को ढूँढता है। वह पाता है की उसका मित्र गहरे रूप से जख्मों हो चुका है और बेहोशी की हालत में है।

जॉर्ज परिचारिका से उसके स्वास्थ्य के बारे में पूछता है। परिचारिका बताती है कि गोली फेफड़ों में गहराई तक धँस गई है और उसे निकाले बिना मित्र का बचना नामुमकिन है। लेकिन समस्या यह थी कि आधार शिविर में कोई सर्जन उपलब्ध नही था, जो गोली निकल सके। गोली निकालना लघबघ असंभव लग रहा था। परिचारिका निराश स्वर में कहती है कि मित्र के पास केवल कुछ घंटे बचे हैं।

जॉर्ज देर तक सोचता है, विचार करता है— अगर गोली नहीं निकाली गई, तो मित्र का बचना असंभव है। इस स्थिति में क्यों न खुद सर्जरी की जाए?

वह परिचारिका की मदद से अपना कॉम्बैट चाकू आग में गर्म लाल तप्त करता है और दृढ़ निश्चय के साथ स्वयं ही सर्जरी कर मित्र के शरीर से गोली निकाल देता है।

सर्जरी के बाद जब जॉर्ज सैनिकों के शिविर में एकांत मे बैठा होता है

तो उसके मन में एक गहरा विचार उमड़ता है—

अब तक इस चाकू से मैंने कितनों को घायल किया,

कितनों की जान ली, लेकिन आज पहली बार मैंने किसी की जान बचाई!

सुबह तक मित्र की स्थिति में सुधार होने लगता है और वह मृत्यु की द्वार से लौट आता  है। मित्र को ठीक होते देख, जॉर्ज अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण निर्णय लेता है—

अब तक मैने अपने हथियार का उपयोग लोगों की जान लेने के लिए किया,

लेकिन अब मै इसका उपयो जीवन देने के लिए करुंगा।

पुस्तक का अगला भाग एक सैनिक के शल्यविशारद (सर्जन) बनने की अद्भुत यात्रा को दर्शाता है। यही कहानी "द हीलिंग नाइफ" के रूप में जानी जाती है, और यह मेरी पसंदीदा पुस्तकों में से एक है।

छुरा वही है!

कुछ लोग इसका उपयोग हत्या के लिए करते हैं,

कुछ लोग इसे देशवासियों की रक्षा के लिए अपनाते हैं,

और कुछ इसे जीवन बचाने का साधन बना लेते हैं।

एक सैनिक के हथियार संग्रह में पड़ा छुरा, जिसे अब तक केवल मारने के लिए इस्तेमाल किया गया था, अचानक उसके लिए जीवन बचाने का उपकरण बन जाता है। यही विचार इस कहानी में हृदय को छू जाता है।

हमारे मन में भी अनगिनत विचार आते हैं,

लेकिन क्या हम उन्हें पकड़ने के लिए सचेत या जागरूकता होते हैं?

हम सचेत भी हैं और विचारों को पहचानने में सक्षम भी हैं,

 तो क्या हमारे अंदर जॉर्ज की तरह स्वयं को बदलने का साहस है ?

उसके प्रती क्रियाशील दृढ़ता है?

जिससे हम अपने विचारों के अनुरूप कार्य कर सकें

और एक 'किलिंग नाइफ' को 'द हीलिंग नाइफ' में बदलने का संकल्प ले सकें ।

इसी तरह का एक विचार अचानक एक युवा वकील के मन में तब आया जब उसे दक्षिण अफ्रीका के पीटरमैरिट्जबर्ग रेलवे स्टेशन पर धक्का दे दिया गया। उस धक्के के बाद उसके मन में एक प्रश्न उठा— "इस राज्य में मैं कौन हूँ?" और इस प्रश्न को पकड़ने के लिए वह युवा जागरूक था; सचेत था। इसी सचेतता के कारण वह युवा 'महात्मा' बन गया।

इसी तरह, एक दिन एक युवक के सामने एक कुष्ठ रोगी आया। पहले तो उसे उस रोगी को देखकर घृणा महसूस हुई, वह वहासे भागना चाहताथा, लेकिन तभी उसके मन में एक विचार जागा— "अगर मैं मनुष्य हूँ, तो मुझे इस रोगी से दूर भागने के बजाय उसकी देखभाल करनी चाहिए।" यह विचार पकड़ने के लिए वह युवा सचेत था, और इसी सचेतता के कारण वह 'महासेवक' बन गया।

इसी तरह, एक युवक के पीछे बंदरों की टोली पड़ गई। बंदरों के हमले से बचने के लिए उसने भागना शुरू किया। तभी एक साधु ने उसे टोका— "अरे! तुम क्यू भाग रहे हो? पलटकर उनका सामना करो!" उस क्षण युवक यह नहीं सोचता कि "हे साधु बाबा, सलाह देने में आपका क्या जाता है, संकट तो मेरे ऊपर आया है।" बल्कि वह इस विचार को पकड़ने के लिए सचेत था— "परिस्थिति से भागो मत, उसका सामना करो!" और इसी सचेतता के कारण वह युवा 'योद्धा संन्यासी' बन गया।

अंतर्मन में उठने वाले विचार— 'अंतरआत्मा की आवाज' को पकड़ने के लिए सचेत होना आवश्यक है। तभी 'किलिंग नाइफ' -'द हीलिंग नाइफ' बन सकता है। यही कारण है कि समर्थ रामदास स्वामी ने श्रीराम प्रभू से अपनी प्रार्थना में केवल एक ही चीज़ मांगी— "सावधपण मज दे रे राम!" अर्थात, "हे राम! मुझे सतर्कता प्रदान करो।"

'अतिथयश्च' का स्वाध्याय करने का अर्थ है मन की सतर्कता बढ़ाना— अनुभव में पूर्वाग्रह के बिना, खुले दिल से शामिल होना, परिस्थितियों का सामना करना और उनसे सीखना। हमारे मन में उठने वाले विचारों और इच्छाओं को अतिथि मानकर उनका स्वागत करना ही 'अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचन' है। इसमें दो महत्वपूर्ण पहलू शामिल होते हैं— मेरे मन में ये विचार क्यों आए? और मैंने उनपर कैसी प्रतिक्रिया की?

हमारी जागरूकता की सीमा में जो कुछ भी आता है,

उसका सामना करना, उसे स्वीकार करना,

उसके उचित हिस्से को अपनाना और उसका प्रसार करना,

साथ ही अनुचित को त्यागना— ये

सब अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचन के अभ्यास के लिए आवश्यक हैं।

तभी हम इस अतिथि का सच्चे अर्थों में स्वागत कर सकते हैं। अन्यथा, यह अतिथि एक घुसपैठीया बनकर  हमारे घर का अर्थात मन और जीवन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगा।

अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च’

प्रशांत दिवेकर

ज्ञान प्रबोधिनी, पुणे


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