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दास डोंगरी राहतो

 दास डोंगरी राहतो 

गो. नी. दांडेकर लिखित दास डोंगरी राहतो पुस्तकातील रामदास स्वामींच्या विद्यार्थी जीवनातील कालखंडाचे वर्णन करणाऱ्या भागाचे विद्याव्रत शिबिरात केलेले अभिवचन ऐकण्यासाठी फोटोवर क्लिक करा. 



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वंदे गुरु परंपरा

वंदे गुरु परंपरा गुरुपौर्णिमा   अर्थात   ज्ञानाच्या   परंपरांचे   पाईक   होण्याचा   दिवस इमं विवस्वते योगं प्रोत्कवानहमव्ययम् । विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत । । (४-१) भगवद् गीतेत देखील श्रीकृष्ण अर्जुनाला उपदेश करताना ज्ञानाच्या परंपरेचा दाखला दिला आहे. ते म्हणतात ‘ मी हा अव्यय ( अविनाशी ) योग सूर्याला सांगितला. सूर्याने मनुला सांगितला व मनूने  इक्ष्वाकू   सांगितला.  भारतीय परंपरेत नवीन ज्ञानतत्वाज्ञाच्या शाखांची मांडणी करताना देखील असा गुरु परंपरेचा वारसा सांगितला जातो. कारण ज्ञानाच्या परंपरेच्या संक्रमणातूनच ज्ञान वृद्धिगत होत जाते.                ज्ञान   प्रबोधिनीने   पथकाधिपती   म्हणून   समर्थ   रामदास ,  स्वामी   दयानंद ,  स्वामी   विवेकानंद   आणि   योगी   अरविंद या चार व्यक्तींचा स्वीकार केला आहे.   त्यापैकी एक म्हणजे समर्थ रामदास! कवि   वामन   पंडितांनी   समर्थांची ...

Vande Guru Parampara

  Vande Guru Parampara Guru Purnima – Honouring Our Gurus, Upholding the Tradition इमं विवस्वते योगं प्रोत्कवानहमव्ययम् । विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत । । (४-१) In the Bhagavad Gita, while advising Arjuna, Lord Krishna gives an example of the tradition of knowledge. He says, “I imparted this indestructible Yoga to the Sun (Vivasvan), who passed it on to Manu, and Manu, in turn, passed it on to Ikshvaku.” In the Indian tradition, whenever new knowledge or philosophy is presented, the legacy of the Guru's tradition is also acknowledged—because knowledge flourishes only when its lineage is preserved and passed on. Jnana Prabodhini has accepted four great personalities—Samarth Ramdas, Swami Dayananda, Swami Vivekananda, and Yogi Arvind—as its visionaries, and pathfinders who have shaped Jnana Prabodhini ideals and direction. Today, let us learn about Samarth Ramdas. The poet Vaman Pandit praises him with the following verse. शुकासारखे पूर्ण वैराग्य ज्याचे...

सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च।

  सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रकृति के सानिध्य में रहकर उसके साथ एकत्व का अनुभव करना , स्वाध्याय का प्रथम सूत्र है , जो हमें ब्रह्मांड के निर्माण और उसके रहस्यों को जानने की प्रेरणा देता है। जड़-चेतन धारणाओं से जुड़ी मूलकण , वंशसूत्र , गुणसूत्र जैसी सूक्ष्मतम चीज़ों के अध्ययन से लेकर ब्रह्मांड के विस्तार के अध्ययन तक का व्यापक आयाम हमें प्रकृति के गहनतम रहस्यों में प्रवेश करने का मार्ग प्रदान करता हैं। ब्रह्मांड के विशाल विस्तार और उसकी अनंतता को समझने का प्रयास करने के लिए पहला उपनिषदिक अध्ययन सूत्र है "ऋतं च स्वाध्याय प्रवचने च।" ऋतम् का अध्ययन ब्रह्मांड के नियमों और संरचनात्मक सिद्धांतों को समझने की कुंजी है। ऋतम् का अध्ययन   केवल दार्शनिक धारणा नहीं है , बल्कि यह ब्रह्मांड की रचना और उसके संचालन में निहित नियमों को   वैज्ञानिक दृष्टिकोणद्वारा गहराई से समझना है। यह हमें   सिखाता है कि ब्रह्मांड किस प्रकार संतुलित और सुव्यवस्थित रूप से कार्य करता है। ऋतम् का स्वाध्याय करते समय हम अपने परिवेश को गहराई से समझने लगते हैं। प्रकृति के रहस्यों की खोज और उन...