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दास डोंगरी राहतो

 दास डोंगरी राहतो 

गो. नी. दांडेकर लिखित दास डोंगरी राहतो पुस्तकातील रामदास स्वामींच्या विद्यार्थी जीवनातील कालखंडाचे वर्णन करणाऱ्या भागाचे विद्याव्रत शिबिरात केलेले अभिवचन ऐकण्यासाठी फोटोवर क्लिक करा. 



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विद्यार्थी + व्रतार्थी = विद्याव्रती

विद्यार्थी + व्रतार्थी = विद्याव्रती                       जुलै महिन्यात झारखंडला जमशेदपूर जवळ घाटशिला गावी शिक्षक प्रशिक्षणासाठी गेलो होतो. पूर्वीसिंघभूम जिल्हयात आर्ट ऑफ लिव्हिंग मार्फत श्री श्री विदया मंदिर नावाने संथाळ आदिवासी भागात या शाळा चालवल्या जातात. टाटानगर पासून  ३-४ तासाच्या अंतरावर असून देखील विकास नाही. नक्षलवादाचा प्रभाव असलेल्या भागात या शाळा स्वयंसेवी वृत्तीने चालवल्या जातात. शाळेला सरकारी अनुदान  नाही तरीही  मोफत शिक्षण आणि मोफत पोषक आहार दिला जातो . शाळेत कुपोषित विद्यार्थी नाहीत  आणि जवळपासच्या सरकारी शाळांचा विचार करता श्री श्री विदया मंदिर शाळेत शैक्षणिक गळती ० %. हे गेल्या दहा वर्षांच्या प्रयत्नातून सध्या झाले आहे. आता या शाळा माध्यमिक टप्प्यापर्यंत पोचल्या आहेत. गुणवत्तापूर्ण शालेय शिक्षणाबरोबर तंत्र शिक्षण देऊन गावात राहण्यासाठी विद्यार्थ्यांना स्वावलंबी बनवणे हे शाळेचे पुढचे उद्दिष्ट आहे. ज्ञान प्रबोधिनी त्यांच्या या प्रयत्नात शिक्षक प्रशिक्षक म्हणून काम करते आहे.     ...

सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च।

  सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रकृति के सानिध्य में रहकर उसके साथ एकत्व का अनुभव करना , स्वाध्याय का प्रथम सूत्र है , जो हमें ब्रह्मांड के निर्माण और उसके रहस्यों को जानने की प्रेरणा देता है। जड़-चेतन धारणाओं से जुड़ी मूलकण , वंशसूत्र , गुणसूत्र जैसी सूक्ष्मतम चीज़ों के अध्ययन से लेकर ब्रह्मांड के विस्तार के अध्ययन तक का व्यापक आयाम हमें प्रकृति के गहनतम रहस्यों में प्रवेश करने का मार्ग प्रदान करता हैं। ब्रह्मांड के विशाल विस्तार और उसकी अनंतता को समझने का प्रयास करने के लिए पहला उपनिषदिक अध्ययन सूत्र है "ऋतं च स्वाध्याय प्रवचने च।" ऋतम् का अध्ययन ब्रह्मांड के नियमों और संरचनात्मक सिद्धांतों को समझने की कुंजी है। ऋतम् का अध्ययन   केवल दार्शनिक धारणा नहीं है , बल्कि यह ब्रह्मांड की रचना और उसके संचालन में निहित नियमों को   वैज्ञानिक दृष्टिकोणद्वारा गहराई से समझना है। यह हमें   सिखाता है कि ब्रह्मांड किस प्रकार संतुलित और सुव्यवस्थित रूप से कार्य करता है। ऋतम् का स्वाध्याय करते समय हम अपने परिवेश को गहराई से समझने लगते हैं। प्रकृति के रहस्यों की खोज और उन...

বন্দে গুৰু পৰম্পৰা

বন্দে গুৰু পৰম্পৰা গুৰু পূৰ্ণিমা মানে জ্ঞান পৰম্পৰাৰ বাহক হোৱাৰ দিন । ইয়াম বিৱস্বতে যোগ প্ৰক্তৱনহম্ভায়ম । বিৱস্বণ মনভে প্ৰাহ মনুৰিক্ষৱকভে ব্ৰেৱীত ।। ( ৪ - ১ ) ( এটি অক্ষয় যোগৰ বিষয়ে মই সূৰ্য দেৱতাক বৰ্ণনা কৰিছো । বিৱস্বণে তেতিয়া মনুক সম্বোধন কৰিলে , আৰু মনুৱে ইক্ষৱাকুক সম্বোধন কৰিলে ) ।           ভাগৱত গীতাত   অৰ্জুনক উপদেশ দিওঁতে ভগৱান শ্ৰীকৃষ্ণই জ্ঞানৰ পৰম্পৰাৰ উদাহৰণ দাঙি ধৰিছে । তেওঁ কয় ,” মই এই অবিনাশী যোগ সূৰ্যক ( বিবাস্বণ ) প্ৰদান কৰিলোঁ , যিয়ে ইয়াক মনুলৈ আগবঢ়াই দিলে । “           ভাৰতীয় পৰম্পৰাত যেতিয়াই নতুন জ্ঞান বা দৰ্শন উপস্থাপন কৰা হয় , তেতিয়াই গুৰুৰ পৰম্পৰাৰ উত্তৰাধিকাৰিকো স্বীকৃতি দিয়া হয় , কাৰণ জ্ঞানৰ বংশ সংৰক্ষণ পাৰ হৈ গ ’ লেহে জ্ঞান বিস্তাৰিত হৈ উঠে ।           জ্ঞান প্ৰবোধিনীয়ে চাৰিজন মহান ব্যক্তিত্ব সমৰ্থ ৰামদাস , স্বামী বিবেকানন্দ আৰু যোগী অৰবিন্দক নিজৰ দূৰদৰ্শী হিচাপে ...